National herald case

0

 





नेशनल हेराल्ड केस में ‘सेक्शन 25’ पर हो रही है सबसे ज्यादा डिबेट

 हेराल्ड को देखें तो 10.1% की ग्रोथ टारगेट कर रहा है।  रेगुलेशन के अकॉर्डिंग किसी भी कस्टमर को बेसिक केवाईसी कराना कंपलसरी है क्योंकि इसको और से बनाती है । जिस तरीके से भी हमारे अखबार -

👉टाइम्स ऑफ इंडिया 

👉हिंदुस्तान टाइम्स 

👉इंडियन एक्सप्रेस 

ठीक इसी तरीके से आजादी से पहले का अखबार नेशनल हेराल्ड था।  जो नेहरू जी ने निकाला था, अपनी बात रखते थे। ऑल ओवर इंडिया में लोगों को पैसे की जरूरत पड़ती है। इंडिया के कोने-कोने से न्यूज़ लाना है, उसे पब्लिश करना है। इसकी सैलरी है रजिस्ट्रेशन बहुत सारी चीजें होती हैं। इस लाने के लिए पैसे इकट्ठे करके एक कंपनी बनाई एसोसिएटेड जनरल लिमिटेड सरकुलेशन होता है। कंपनी हिंदुस्तान टाइम्स। कस्तूरी एंड संस लिमिटेड अंतर होते 5000 फ्रीडम फाइटर पर एक चीज ध्यान रखिएगा कि जो कंपनी चाहिए, इसका कोई असर नहीं था। जनरल न्यूज़ पेपर पब्लिश्ड करना और लैंग्वेज में पब्लिश किए। 1989 में का इंग्लिश दूसरा हिंदी और उर्दू इंग्लिश में उसका नाम पेट्रोल हिंदी में जो अखबार था, उसका नाम था नवजीवन और जो उर्दू में एक बार था, उसका नाम था। कौमी आवाज भेजें। इसमें जो नेशनल हेराल्ड था, उसको 1942 में बहन भी कर दिया था और फिर आगे चलकर 1945 के बाद ही फिर से चालू हो गया था उसके बाद।
टीम के जूते उनके कैरियर की आनंद भवन जो कि इलाहाबाद में राहु समय जहां पर रहते थे, उसको भी बेचना पड़ जाए तो उसको भेज देंगे, नहीं देंगे, लेकिन आगे चलकर भी न्यूज़ पेपर आए तो होने लगा था कि 2008 में नेशनल हेराल्ड को बंद करना पड़ा, लेकिन नेट बंद होने की वजह से कोई रियल कंपनी थी। उसके असर को लेकर असली कॉन्ट्रोवर्सी स्टार्ट होती है। देखिए एल कंपनी के अर्थ को लेकर जो बात है इसको इस तरीके से समझ में माली ₹30000 कमा रहा है कि आपके पास जमीन होम शॉप हो। गोल्ड वगैरह हो तो यह सारी जो चीज है।
जिसको लेकर पूरा बवाल हुआ पहले तो आप यह कहोगे जेल का काम चलाने का था। इसके पास कहां पर आ गए। बंद हो गया है जो कंपनी है फिर वह क्या काम कर रही थी? एजीएल कोई नार्मल कंपनी नहीं। हमारा देश आजाद होने से पहले से ही हमारे देश की आवाज़ थी और हमारे प्राइम मिनिस्टर इमोशनली का टाइम टू टाइम टेबल को न्यूज़ अलग-अलग जगह पर चलाने के लिए ऑफिस बनाने के लिए स्टेट ओर सेंट्रल गवर्नमेंट से जमीन मिलती थी ताकि इन ऑल ओवर इंडिया में अपनी ब्रांच चला पाए और कुछ लीज होल्ड प्रॉपर्टी होती थी और कुछ होती थी। यह फ्रीहोल्ड प्रॉपर्टी प्रॉपर्टी का मतलब हुआ कि कुछ टाइम के लिए प्रॉपर्टी दी गई है।
20 साल या 50 साल की दोस्त को दिया गया जिस पर डेट और टाइम भी नहीं होती गई है। उसको टाइम तक आप उसको यूज कर सकते हो, उसका भेज नहीं सकते। उस पर आप का मालिकाना हक नहीं होता। मगर फ्रीहोल्ड प्रॉपर्टी की बात करें तो इसका मतलब हुआ कि फ्री में आपको प्रॉपर्टी दी गई है। पूरा मालिकाना हक आपके पास हो तो आप चाहो तो उसको भेज भी सकते हो तो यह जो जेल है स्कूल लीज होल्ड प्रॉपर्टी और फ्रीहोल्ड प्रॉपर्टी दोनों मिली थी। 2013 में होगी। पंचकूला में सीबीआई की जांच चल रही है। जहां पर की लीज होल्ड प्रॉपर्टी को इन लीगल तरीके से दे दिया। क्या पंचकूला की प्रॉपर्टी थी? जेल की प्रॉपर्टी अभी हम बात करें। नेशनल  हेराल्ड की बात कर रहे हैं तो 2008 में जब नेशनल हेराल्ड न्यूज़  पर बंद हुआ, उसके बाद एजेएल ने प्रॉपर्टी का काम शुरू कर दिया सकता। न्यूज़पेपर चलाने का तो बंद हो गया। उसके बाद में प्रॉपर्टी का काम शुरू कर दिया। मतलब जो प्रॉपर्टी एजेंट के पास थी उसको मॉल शॉपिंग कंपलेक्स वगैरह को रेंट पर देना शुरू कर दिया और उससे कमाई होने लगी। एजीएल की जो प्रॉपर्टी है ये मेंन कंट्रवर्सी की जर है






तो एक बार देख लेते। की टोटल प्रॉपर्टी है कितनी कहां कहां पर है यह प्रॉपर्टी और उस प्रॉपर्टी की वैल्यू कितनी है ताकि आगे जो पूरा को समझने में आसानी रहेगी। मुंबई न्यू दिल्ली, लखनऊ, भोपाल इंदौर पंचकूला पटना इन जगह एजीएल  की प्रॉपर्टी प्रॉपर्टी की कीमत की बात करें तो उसका जो रेट है वह हर आर्टिकल में अलग अलग लिखा है। लेकिन ज्यादातर आर्टिकल में 10 हजार करोड़ लिखी है   लेकिन 10 में से 8 आर्टिकल देखेंगे तो दो हजार करोड़ तो मैं दो हजार करोड़  लिखा है तो मैं दो हजार करोड़ ले के चल रहा हूं। इसमें बहुत सारे आर्टिकल में मेंशन नहीं है। ये जो  रेट है 2000 करोड़ का यह एजीएल की प्रॉपर्टी 2000 करोड़ की है। डीएलसी रेट यानी कि वह रेड जो गवर्नमेंट डिसाइड करती है, कितनी प्रॉपर्टी का पीछे जो लोग जमीन खरीदते हैं, भेजते हैं, उनको पता होगी। इंडिया के अंदर ओरिजिनल प्राइस पर जमीन नहीं मिलती है जो डीएलसी रेट होता है। उस रेट पर पेपर दोसा इन हो जाते हैं। लेकिन टैक्स बचाने के चक्कर में बाकी पैसा जो होता है, वह बैक डोर से लिया जाता है। यह भी देख लेते हैं। की ये जो एजीएल कंपनी थी ये शुरू तो 5000 फ्रीडम फाइटर ने की थी  लेकिन अभी क सके नाम पर है? 



देखिए 2008 आते - आते  5000 में से कई फ्रीडम फाइटर  दुनिया में नहीं रहे थे तो टोटल 1054 शेयर होल्डर्स थे । बचे हुए 33% शेयर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के थे। करीब 20% से ज्यादा ललित शोरी के थे ये भी कांग्रेस के खेमे से ही थे । 5% शेयर अमिताभ बच्चन के भी थे  की ये भी बोला जाता हैं। वह इसलिए क्योंकि एक कंपनी जिसका एड्रेस बताओ अमिताभ बच्चन जी के घर का था इसलिए लोग एसुमे करते हैं कि यह भी इन्होंने लिए होंगे ऑन रिकॉर्ड में कई बार इनसे पूछा गया जिसका जवाब नहीं दिया। कुछ कैसे उसको छोड़ दिया जाए। उन्होंने आगे चलकर अपनी आईडी चेंज नहीं की। यह कहा जा सकता है कि एजीएल की जो ओनरशिप कांग्रेस के हाथ में थी क्योंकि हर अथॉरिटी  जैसे डायरेक्टर यह सब कांग्रेस के पास ही थी। एजीएल जो कंपनियों है वो बंद नहीं हुई है। वह अपना प्रॉपर्टी का बिजनेस करके कमाई कर रही है। प्रॉपर्टी की जो कीमत है वह हमने डीएलसी रेट के हिसाब से दो हजार करोड़ मान ली है और इसी एजेंट के पास। हमें मांगे चल रहा है कि कांग्रेस के लोगों के पास है क्योंकि सारी हायर अथॉरिटी पर कांग्रेस के लोग ही बैठे हैं। उसे इतनी ज्यादा है कि अब इसमें एक चीज और ऐड कर देता हूं कि कांग्रेस ने जेल कोटा होता है। जब कोई तो 90 करोड वापस करने हैं। कांग्रेस को कांग्रेस का कहना है कि कांग्रेस के जल को देश की धरोहर मानती है। इसलिए पैसा देकर उसने इस कंपनी को बंद होने से बचाने की पूरी कोशिश की है जो 90 करोड का लोन है या तो एशियन कांग्रेस को पैसा देकर लोन खत्म कर दें और अगर पैसा नहीं है तो अपनी इतनी प्रॉपर्टी में से कुछ प्रॉपर्टी को भेजकर कांग्रेस को पैसा लौटा दे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। 2010 में कंपनी में स्टार्ट होती है। यंग इंडिया लिमिटेड के नाम से जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के 76%  शेयर्स होते हैं और बाकी के 24%शेयर्स  होते हैं। यह कांग्रेस लीडर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस के नाम पर होते हैं, जो कंपनी है। इसको सेक्शन 25 के तहत खोला गया। सेक्शन 25 का मतलब यह हुआ कि एक non-profit कंपनी है जिसका पैसा सिर्फ और सिर्फ के ऑब्जेक्टिव में यूज़ हो सकता है।
एग्जांपल ⚡
मान  लो आप लोगों से पैसा इकट्ठा करके ही दम खोलना चाहते हो तो पैसा इकट्ठा होगा या आप अपने पर्सनल अकाउंट में तो लोगे नहीं। वह कैसे होगा कि जो पैसा अपने लोगों से कटा किया है। वह अपने वृद्ध आश्रम में यूज भी नहीं तो ऐसे कैसे मैं आपको एक नॉनप्रॉफिट कंपनी खोलनी होगी और सारा पैसा उस नॉनप्रॉफिट कंपनी के अकाउंट से ही मैनेज होगा और सारा पैसा उस वृद्ध आश्रम में यूज कर सकते हो। उस पैसे को आप अपने लिए नहीं कर सकते हो। ⚡
आप नॉनप्रॉफिट कंपनी को आपको सिर्फ मैनेज करना होगा तो इंडिया कंपनी है। यह कंपनी है जिसका ऑब्जेक्टिव जाने से इसमें तीन रेडी हो गई है जो कि एक पब्लिक कंपनी है। पब्लिक कंपनी मतलब कि लोगों ने पैसा इकट्ठा करके कंपनी को बनाया है। यह कंपनी किसी अकेले की नहीं है जिसके पास जितने शेर उसका उतना हक होगा। इस कंपनी में और
दूसरा कांग्रेस जो कि एक पॉलिटिकल पार्टी है
और तीसरी यंग इंडियन जो कि एक non-profit कंपनी है
तो ये जो तीन
एंटिटी मैंने बताइए आपको इनमें आपस में कुछ ऐसे ट्रांसेशन  इलेक्शंस की है। पूरे देश में बवाल मच गया और गांधी परिवार को इसकी वजह से कोर्ट में और ईडी के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कोई ट्रांजैक्शन किस तरीके से करते हैं? कांग्रेस को ऐसे से वापस लेना था तो कायदा तो यह कहता है कि एजीएल को यह पैसा कांग्रेस को वापस कर देना चाहिए। चाहे कमाकर या फिर अपने एहसास को बेचकर पैसा वापस कर देना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। इसकी बजाय एक ही नाम से कंपनी खोली जाती है। यंग इंडिया कंपनी ₹5000000 कांग्रेस को देती है और यह 90 करोड़ का लोन का जो कांग्रेस को जेल से वापस लेना था, इसकी ओनरशिप कांग्रेसी यंग इंडिया को दे देती है। मतलब क्या बे जेल को 90 करोड रुपए यंग इंडिया को देने होंगे। पहले जो उसको कांग्रेस को देने थे लेकिन इससे भी बड़ी चीज है कि जैसे यह लोन के ओनरशिप यंग इंडिया के पास आइए जल्दी करो।  एजीएल ने लौटाने की बजाय अपनी कंपनी के सारे शेयर यंग इंडिया को दे दिए। इसका मतलब यह हुआ कि 90 करोड लौटाने  की वजह  एजीएल  ने दो हजार करोड़ की पूरी प्रॉपर्टी  यंग इंडिया के नाम कर दी।
⚡अभी कोई व्यक्ति आपने किसी को 1000000 का लोन दे दिया। वह आदमी एक न्यूज़पेपर चलाता है जिसे वह महीने का ₹10000 कमा लेता है। इसके साथ-साथ उसके पास दो करोड़ की जमीन भी है। जमीन साउथ दिल्ली में है। कुछ मुंबई में है और कुछ गाजियाबाद में है। उसका न्यूज़ पेपर  लॉस में जाने लगता है तो उसने न्यूज़पेपर बंद कर दिया और जो उसके ऊपर लोन था 1000000 रुपए का जो कि वह अपनी एक छोटी सी गाजियाबाद की प्रॉपर्टी बेचकर पूरा करने की बजाय उसने अपनी पूरी दो करोड़ की तो सारी की सारी प्रॉपर्टी है जो आप के नाम कर दी।⚡
यही चीज यहां भी हुई है। कंपनी जिसका नाम यंग इंडिया है जो सिर्फ ₹500000 से शुरू हुई थी। 5000000 रुपए देके कॉन्ग्रेस को दो हजार करोड़ के एसएस की ऑनर बन जाती है और वहीं एक कंपनी जिसका नाम एजेएल है वह जो कि दो हजार करोड़ की मालिक थी। वह 90 करोड़ के लोन के चक्कर में अपने दो हजार करोड़ की सारी प्रॉपर्टी यंग इंडिया के नाम कर देती है तो सारी चीजें है ये अननोटिस्ड होती है ।
कांग्रेस की भी साइट बताऊंगा अभी जो आरोप लगाए गए हैं कांग्रेस के ऊपर वह समझ लेते हैं। सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा के अंदर जो डायरेक्टर और जो कांग्रेस पार्टी के अंदर भी इंपोर्टेंट क्वेश्चन होल्ड करते हैं, सारे के सारे लोग हैं जो पीपल यूज़ करके और छोटी सी प्रॉपर्टी बेचकर पूरा कर सकती थी। उसकी बजाय उसने अपनी कंपनी के सारे शहर से इंडिया के अंदर क्यों कर दिए थे जिन्होंने कई कांग्रेसी पॉलिटिकल पार्टी है। एक पॉलीटिकल पार्टी किसी भी कंपनी को कमर्शियल परपज के लिए पहली जीत सलोनी नहीं दे सकती। यह रिप्रेजेंटेशन आफ पीपल्स एक्ट 1950 सेक्शन 30a ऑफ इनकम टैक्स एक्ट 1961 के हिसाब से ये इलीगल एक्टिविटी है । और उनके अर्थ विदेश में कैसे ट्रांसफर करें तो खाली कांग्रेस के जो शेर होते हैं। उनको ₹5000000 कांग्रेस पार्टी को दिए थे और एजीएल के 90 करोड़ का जुनून था। उसकी ओनरशिप ले ली थी। एक करोड़ का लोन गलत तरीके से लिया था और फिर जाकर कांग्रेस को ही पैसे ट्रांसफर किए थे। इसके साथ-साथ जिस कंपनी रजिस्टर्ड है वहां कोई कंपनी। दूसरी चीज डॉटर चाहिए कि इसने यंग इंडिया को डोनेशन भी है और जब यंग इंडिया की बुक्स भेजी गई तो वहां पर पता चला कि मीडिया ने 10000000 रुपए को डोनेशन नहीं दिखाया, जबकि लोन दिखाया । जब 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने केस फाइल किया था। तब वह बीजेपी के मेंबर भी नहीं थे। बीजेपी के मेंबर को 2013 अगस्त में बने ।
⚡ईडी
⚡इनकम टैक्स डिपार्टमेंट
ईडी पूरे केस में मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल देख रही है ,
और इनकम टैक्स इसलिए है क्योंकि 2011 -2012 में इनकम बताई थी। राहुल और सोनिया गांधी ने एजेएलएल के टेकओवर के टाइम पर डिटेल मिसमैच हो रहे थे
  इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने यह तक बोल दिया के कांग्रेस ने यह लोन एजेएल को दिया भी है यह कोई ट्रिक ही है। चुकी कांग्रेस के पास कोई  रिकॉर्ड नहीं था। एजेएल की 72 
 एनुअल रिपोर्ट 2010 में आई थी। उसमें लोन का कही मेंशन ही नहीं था । जब राहुल गांधी और सोनिया गांधी के  ने जब एजीएल के 10 करोड़ के प्रॉपर्टी 
इंदरजीत कांग्रेस तो कांग्रेस चल रही है इसलिए बाहर वाले की जो इंटरफेयर मंदिर स्वामी का कहना है कि जमीन जो है, गवर्नमेंट की थी जिसको न्यूज़पेपर चलाने के लिए दिया गया था। जिन लोगों का पैसा इसको आप पर्सनल मैटर नहीं बोल सकते हैं। जब पूछा गया कि क्या इस पर कांग्रेस ने कहा कि कांग्रेस एक पॉलिटिकल पार्टी है। यह किसी कमर्शियल एंटिटी को टेकओवर नहीं कर सकती। इसलिए इन इंडिया को लेकर के लोन की जो उन्हें सोनिया गांधी को 76% शेयर क्यों दिए गए?
इससे उनको कुछ नहीं हो सकता है। इस चीज का नोट भी किया जा सकता है। इसका एक करोड़ के लिए आपने एजेंसी दो हजार करोड़ की प्रॉपर्टी प्रॉपर्टी बेचकर भी पूरी कर सकते थे। इस पर्सेंट बचा नहीं जा सकता।
परसेंटेज के पास प्रॉपर्टी प्रॉपर्टी के रेट चेक किया गया तुझे प्रॉपर्टी उसका रेट ₹600000000 का 240 करोड़ लखनऊ का 300 करोड़ का।
सबके सामने आना।
x

Tags

Post a Comment

0Comments

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*