जानिये भारत को राफेल विमान की जरुरत क्यों पड़ी? 🧐
भारत ने अपनी वायुसेना को मजबूत करने के लिए वर्ष 2007 में मल्टीरोल नए लड़ाकू विमानों के लिए टेंडर जारी किये थे जिसमें अमेरिका ने एफ-16, एफए-18,
रूस ने मिग-35 , स्वीडेन ने ग्रिपिन, फ्रांस ने राफेल और
यूरोपीय समूह ने यूरोफाइटर टाइफून की दावेदारी पेश
की थी। 27 अप्रैल 201 को आखिरी दौड़ में यूरोफाइटर
और राफेल ही भारतीय परिस्तिथियों के अनुकूल पाए गए
थे और अंततः 5 जनवरी 2012 को सस्ती बोली व फील्ड
ट्रायूल के दौरान भारतीय परिस्थितियों और मानकों पर
सबसे खरा उतरने के कारण यह टेंडर राफेल को दिया
गया था.
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने 126 रफेल जेट खरीदने के
लिए 2 अरब डॉलर की डील की थी जिसमें एक जेट
विमान की कीमत 629 करोड़ रुपये थी। वर्तमान में
बीजेपी सरकार एक जेट विमान को खरीदने के लिए 161
करोड़ रुपये (मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार) खर्च कर रही
रफेल जेट को फ्रांस की कम्पनी दसॉँल्ट एविएशन के द्वारा
बनाया जाता है। uPH की सरकार के समय तय हुआ कि
फ्रांस की कम्पनी15 तैयार विमान देगी और बकाया के
विमान भारत में हिंदुस्तान एरोनोॉटिक्स लिमिटेड वे
साथ बनाये जायेंगे। इस समझौते में यह भी तय हुआ था
कि फ्रांस विमान बनाने की पूर्ण तकनीकी का हस्तांतरण
भी भारत को करेगा।
भारत को राफेल डील की जरुरत क्यों पड़ी
जैसा कि सभी को पता है कि भारत हमेशा से लड़ाकू
विमानों की खरीद रूस से करता आ रहा है। आज भी
भारत की वायुसेना में रूस में बने विमान; मिग-21,
मिग-27, सुखोई-30 जैसे विमान शामिल हैं। मिंग-21 और
मिग-थ की स्क्वाड्ून में गिरावट आई है और उम्मीद है कि
2018 के अंत तक ये पूरी तरह से आउटडेटिड हो जायेंगे।
इनकी जगह नई तकनीकी के विमानों को लाना होगा।
ज्ञातव्य है कि भारतीय वायुसेना की ताकत केवल 3
स्क्वाड्ून तक सिमट गयी है। लेकिन भारत को दो मोचों
पर युद्ध करने के लिए 2027-32 की अवधि तक कम से
कम 42 स्क्वाड्ून की जरुरत होगी। ध्यान रहे कि एक
स्क्वाड्ून में 12 से 24 के बीच विमान होते हैं।
फ्रांस की डेसॉल्ट एविएशन नाम की कम्पनी ने भारत को
कुल4 राफेल जेट दे दिए हैं. हालाँकि अभी ये जेट, भारत
नहीं आये हैं क्योंकि भारतीय चालकों को ट्रेनिंग दी जा
रही है और लगभग मई 2020 तक इन चारों राफेल जेट के
भारत पहुँचने की उम्मीद है. इस लेख में हमने यह बताया
है कि राफेल विमान कितना शक्तिशाली है और भारत को
इस विमान की जरुरत क्यों पड़ रही है.
देश की बूढ़ी होती वायुसेना की ताकत को नई ऊर्जा
देने के लिए भारत सरकार ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू
विमान खरीदने की पहल 2012 में शुरू की थी और अंततः
नवम्बर 2019 को इस डील के चार जेट भारत को मिल गये
हैं लेकिन अभी भारत नहीं आये हैं.
ज्ञातव्य है कि भारत ने अपनी वायुसेना को मजबूत करने
के लिए वर्ष 2o07 में मल्टीरोल नए लड़ाकू विमानों के लिए
टेंडर जारी किये थे जिसमें अमेरिका ने एफ-16, एफए-18,
रूसने मिग-35, स्वीडेन ने ग्रिपिन, फ्रांस ने राफेल और
यूरोपीय समूह ने यूरोफाइटर टाइफून की दावेदारी पेश
की थी। 27 आप्रैल 2011 को आखिरी दौड़ में यूरोफाइटर
और राफेल ही भारतीय परिस्तिथियों के अनुकूल पाए गए
थे और अंततः उ1 जनवरी 2012 को सस्ती बोली व फील्ड
ट्रायल के दौरान भारतीय परिस्थितियों और मानकों पर
सबसे खरा उतरने के कारण यह टेंडर राफेल को दिया।
गया था.
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने 126 रफेल जेट खरीदने के
लिए 12 अरब डॉलर की डील की थी जिसमें एक जेट
विमान की कीमत 629 करोड़ रुपये थी। वर्तमान में
बीजेपी सरकार एक जेट विमान को खरीदने के लिए 161
करोड़ रुपये (मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार) खर्च कर रही
रफेल जेट को फ्रांस की कम्परनी द्सॉल्ट एविएशन के द्वारा
बनाया जाता है। uPH की सरकार के समय तय हुआ कि
फ्रांस की कम्पनी 18 तैयार विमान देगी और बकाया के
1o8 विमान भारत में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के
साथ बनाये जायेंगे। इस समझौते में यह भी तय हुआ था
कि फ्रांस विमान बनाने की पूर्ण तकनीकी का हस्तांतरण
भी भारत को करेगा।
भारत को राफेल डील की जरुरत क्यों पड़ी
जैसा कि सभी को पता है कि भारत हमेशा से लड़ाकू
विमानों की खरीद रूस से करता आ रहा है। आज भी
भारत की वायुसेना में रूस में बने विमान; मिग-21,
मिग-27, सुखोई-50 जैसे विमान शामिल हैं। मिंग-21 और
मिग-27 की स्क्वाड्रन में गिरावट आई है और उम्मीद है कि
2018 के अंत तक ये पूरी तरह से आउटडेटिड हो जायेंगे।
इनकी जगह नई तकनीकी के विमानों को लाना होगा।
मई 1991 को उड़ान भरी थी। वर्ष 1986 से 2018 तक इस
विमान की 165 यूनिट बन चुकी हैं। राफेल H, B.CऔरM
श्रेणियों में एक सीट और डबल सीट और डबल इंजन में
राफेल हवा से हवा के साथ हवा से जमीन पर हमले के
साथ परमाणु हमला करने में सक्षम होने के साथ-साथ
बेहद कम ऊँंचाई पर उड़ान के साथ हवा से हवा में
मिसाइल दाग सकता है। इतना ही नहीं इस विमान में
ऑक्सीजन जनरेशन सिस्टम लगा है और लिक्विड
ऑँक्सीजन भरने की जरूरत नहीं पड़ती है।
यह विमान इलेक्ट्रानिक स्कैनिंग रडार से श्रीडी मैपिंग
कर रियल टाइम में दुश्मन की पोजीशन खोज लेता है।
इसके अलावा यह हर मौसम में लंबी दूरी के खतरे को भी
समय रहते भांप सकता है और नजदीकी लड़ाई के दौरान
एक साथ कई टारंगेट पर नजर रख सकता है साथ ही यह
जमीनी सैन्य ठिकाने के अलावा विमानवाहक पोत से भी
उड़ान भरने के सक्षम है।
राफेल विमान के बारे में 10 रोचक तथ्य
1. यह 56 हजार फीट से लेकर 50 हजार फीट तक उड़ान
भरने में सक्षम है। इतना ही नहीं यह 1 मिनट में 50 हजार
फीट पर पहुंच जाता है।
2. यह 3700किमी। की रेंज कवर कर सकता है।
3. इसकी रफ़्तार 1920 किमी प्रति घंटे है।
4. यह 1312 फीट के बेहद छोटे रनवे से उड़ान भरने में
सक्षम है।
5. यह 15.59o गैलन ईधन ले जाने की क्षमतारखता है
6 राफेल, हवा से हवा में मारक मिसाइलें ले जाने में सक्षम है।
7. राफेल एक बार में 2,000 समुद्री मील तक उड़ सकता है।
৪. राफेल, अमेरिका के F-16 की तुलना में ०,82 फीट
ज्यादा ऊंचा है।
9.राफेल, अमेरिका के F-16 की तुलना में olr9 फीट
ज्यादा लंबा है।
10. इसके विंगों की लम्बाई 1090 मीटर, जेट की ऊँचाई
5.30 मीटर और इसकी लम्बाई 15.30 मीटर है।
सभी रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अब जंग उसी देश के
द्वारा जीती जाएगी जिसकी वायुसेना में ताकत होगी वायुसेना द्वारा जीती जाएगी जिसकी वायुसेना में ताकत होगी। थल
सेना के द्वारा जंग जीतने के दिन लद गए हैं। ऊपर दिए
गए आंकड़े यह सिद्ध करते हैं कि राफेल विमान बहुत ही
जबरदस्त लड़ाकू विमान है और अगर भारत को दक्षिण
एशिया में शत्त्ति संतुलन रखना है तो उसे यह विमान
जल्दी से जल्दी अपनी वायुसेना में शामिल कर लेना
चाहिए।


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